शासकीय प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षिकाओं की मनोवैज्ञानिक समस्याएँ महासमुन्द जिले के महासमुन्द विकासखंड के विशेष संदर्भ में
श्रीमती सीमा टंडन1 डा जया ठाकुर डा एल-एस- गजपाल
1शोधार्थी पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2निर्देशक विभागाध्यक्ष (समाज शास्त्र), शासकीय महाप्रभु वल्लभाचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
महासमुन्द छ-ग-
3सहनिर्देशक समाज शास्त्र अध्ययन शाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू
प्रस्तुत शोघ पत्र महासमुन्द विकासखंड के प्राथमिक विद्यालयों की 300 शिक्षिकाओं की मनोवैज्ञानिक समस्याओं का अध्ययन है। वर्तमान समय में शिक्षित महिलाओं द्वारा नौकरी करने की जो लहर आई है उसका उसके संपूर्ण व्यक्तित्व पर तथा पारिवारिक संबंधों पर असर पड़ना लाजिमी है उन्हें एक ओर गृहिणी और दूसरी ओर जीविकोपार्जक दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है, इस दोहरी भूमिका को निभाने में इनकी ऊर्जा और समय दोनों ही लगता है प्रायः इस दोहरी भूमिका की परस्पर विरोधी आवश्यकताओं के बीच जूझना पड़ता है। शिक्षिकाओं को अतिरिक्त उत्तरदायित्व निभाना पड़ता है इस कारण उनके पारिवारिक संबंधों पर प्रभाव पड़ता है जिससे उन्हें मानसिक तनाव और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
शासकीय प्राथमिक विद्यालय, शिक्षिकाओं की मनोवैज्ञानिक समस्याएँ
कार्यरत शिक्षिकाओं द्वारा दोहरी भूमिका निभाने के कारण कई महत्वपूर्ण पक्ष उपेक्षित रह जाते हैं उनके पारिवारिक एवं कार्यकारी संबंधों में बेहतर सामंजस्य नहीं हो पाने के कारण कई बार उनके परिवार एवं कार्य स्थल में प्रभाव दिखाई पड़ता है, नौकरी करने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आने के साथ-साथ उनकी मनोवैज्ञानिक द्वन्द में भी वृद्धि हुई है।
‘‘एक तरफ नारी होने के नाते उन्हें जैविक क्रियाएँ पूरी करनी होती है तो दूसरी ओर एक समर्पित, मर्यादित, सुसंस्कृत गृहिणी की और साथ ही नौकरी संबंधी कर्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वाह करना होता है इन दोनों ही रूपों में उसे अपनी भूमिका निभानी होती है। कभी-कभी वह स्वयं भी इस दोहरी भूमिका का निर्वाह करते-करते अपने आप को सामंजस्य करने में कठिनाई अनुभव करती है।‘‘1
मनोवैज्ञानिक समस्या - जब एक महिला घर से बाहर नौकरी के लिए निकलती है तो उन्हें अपने सभी घरेलू कार्य निपटाने होते हंै। एक महिला पहले पत्नी फिर माँ की भूमिका में होती है उसके साथ नौकरी संबंधी भूमिका जुड़ जाने से कई प्रकार की परेशानियाँ उत्पन्न हो जाती है। घर और बाहर दोनों जगहों पर उत्तरदायित्व को पूरा करने की उनकी अभिलाषा के कारण ही उनके अन्तर में संघर्ष और तनाव पैदा होते हंै। उनके उत्तरदायित्वों में सही रूप से तालमेल तथा परिवार के सभी सदस्यों की अपेक्षाएँ पूर्ण नहीं कर पाने की स्थिति में वे तनावग्रस्त हो जाती हैं और कई प्रकार की मानसिक समस्याएँ बढ़ जाती हंै।
‘‘सुभाषचंद्र गुप्ता ने अपने अध्ययन में यह स्पष्ट किया है कि पत्नी और माँ की भूमिका में नौकरी संबंधी भूमिका के जुड़ जाने से बहुत सी परेशानियों का सामना करती हैं समय पर कार्य पूर्ण नहीं होने के कारण स्वयं को जिम्मेदार मानने लग जाती हैं।‘‘2
मन में विचार करती रहती हैं जिससे उनके मन स्थिर नहीं रह पाता और कई प्रकार की परेशानियाँ चाहे वो स्वास्थगत हो या मानसिक दबाव, बढ़ जाता है।
‘‘प्रमिला कपूर ने अपने अध्ययन में पाया की शिक्षित कामकाजी महिलाएँ दोहरी भूमिका का निर्वहन करने के कारण अनेक मनोरोगों का शिकार हो जाती हंै। जिसका प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर पड़ता है।‘‘3
कार्य को पूर्ण करने के लिए शिक्षिकाएँ हर संभव प्रयास करती हैं लेकिन फिर भी वे पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो पाती।
‘‘उर्मिला जेठानी ने अपने अध्ययन के आधार पर अविवाहित कामकाजी महिलाओं में अविवाहित होने के कारण कार्यस्थल में उत्पन्न समस्या के फलस्वरूप मानसिक तनाव का महिला और परिवार पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया हैं।‘‘4
इसी प्रकार नीरा देसाई का अध्ययन भी महिला के कामकाजी होने के कारण उसके परिवार में भूमिका पर प्रभाव से संबंधित हैं। अध्ययन में महिला के रोजगार का परिवार की भूमिका पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे मे विस्तृत विश्लेषण किया गया है पति -बच्चे और परिवार महिलाओं की जिम्मेदारी माने जाने की सोच ने कई प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं को बढ़ाया है। 5
उद्देश्य -
1. उत्तरदाताओं को दोहरी भूमिका के कारण होने वाली मनोवैज्ञानिक समस्या का अध्ययन करना।
2. उत्तरदाताओं की भूमिका सामंजस्य का अध्ययन करना एवं स्वयं के लिए मिलने वाली समय के बारे में अध्ययन करना।
परिकल्पना -
दोहरी भूमिका के कारण शिक्षिकाएँ बहुत अधिक मानसिक तनाव महसूस करती हैं जिससे मानसिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
अध्ययन क्षेत्र का परिचय -
प्रस्तुत अध्ययन हेतु महासमुन्द जिले के महासमुन्द विकासखंड का चयन किया गया हैं जो रायपुर से 55 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
उत्तरदाताओं का चयन-
अध्ययन हेतु महासमुन्द जिले के महासमुन्द विकासखंड के शासकीय प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत महिला सहायक शिक्षक पंचायत का चयन किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन में उत्तरदाताओं का चयन दैव निदर्षन प्रविधि के अंतर्गत लाटरी प्रणाली के माध्यम से किया गया है। अध्ययन हेतु कुल 377 महिला सहायक शिक्षक पंचायत में से 300 (80 प्रतिषत) का चयन उत्तरदाता के रूप में किया गया है।
तथ्य संकलन-
तथ्यों का संकलन साक्षात्कार अनुसूची एवं अवलोकन द्वारा किया गया है।
उपरोक्त तालिका क्रमांक 1 से स्पष्ट है कि सर्वाधिक 53.4 प्रतिशत उत्तरदाताओं में कार्य की अधिकता से चिड़चिड़ापन आ जाता है, 21 प्रतिशत उत्तरदाताओं को गुस्सा और चिड़चिड़ापन दोनों आता है, 11.7 प्रतिशत उत्तरदाताओं पर अधिक कार्य का प्रभाव उतना नहीं पड़ता, 8.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं को गुस्सा आता है, 4.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं को नींद नहीं आने की समस्या हो जाती है, 1.3 प्रतिषत उत्तरदाताओं को भय लगता है।
कामकाजी महिलाओं का कहना था कि दोनों ही जगह में कार्य करने से चिड़चिड़ापन जल्दी बढ़ जाता है। कई शिक्षिकाएँं स्कूल में प्रधान पाठक के प्रभार पर कार्य कर रही थी अतः उन्हें अधिक कार्य करना पड़ता है कई बार स्कूल के कार्य की अधिकता, प्रशिक्षण, विभिन्न प्रकार की बैठकों का आयोजन किया जाता है। जिससे अधिक समय लग जाता है। चिड़चिड़ापन एवं गुस्सा कार्य के दबाव के कारण स्वभाव में आ जाता है।
उपरोक्त तालिका क्रंमाक 02 से स्पष्ट है कि सर्वाधिक 66.7 प्रतिशत शिक्षिकाएँ अपने स्वास्थ का ख्याल रख पाती हंै जबकि 33.7 प्रतिशत उत्तरदाता समय नहीं मिलने के कारण स्वास्थ का सही ध्यान नहीं रख पाती।
स्वास्थ का सही ढंग से ख्याल नहीं रख पाने का प्रमुख कारण समय का अभाव होना पाया गया कार्य को प्राथमिकता देने से स्वास्थगत समस्या को अनदेखा कर जाती है जिससे शिक्षिकाओं का स्वास्थ ठीक नहीं रहता। जबकि अधिकांश शिक्षिकाओं का कहना था कि छोटी छोटी परेशानियों को बढ़ने से पहले आवष्यकता पड़ने पर उचित उपचार करवाती हैं
तालिका क्रमांक 03 से स्पष्ट है कि सर्वाधिक 76 प्रतिषत उत्तरदाता दोहरी भूमिका होने के कारण स्वास्थ का ख्याल नहीं रख पाती, 15 प्रतिशत शिक्षिकाएँ कार्य की अधिकता के कारण, 09 प्रतिशत स्वयं के लिए समय नहीं होने के कारण स्वास्थ का ख्याल नहीं रख पाते।
स्वास्थ का सही ख्याल नहीं रख पाने के कारण शिक्षिकाओं को शारीरिक समस्या का सामना करना पड़ता है दोहरी भूमिका एवं कार्य का व्यामूकता जिसमें घरेलू कार्य के साथ कार्यक्षेत्र की जिम्मेदारियां शामिल है का निर्वहन करने के कारण बहुत थक जाती है।
उपरोक्त तालिक क्रमांक 04 से स्पष्ट है कि सर्वाधिक 82.3 प्रतिशत उत्तरदाता का कहना है कि परिवार एवं संस्था के कार्यों में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाने पर मानसिक तनाव होता है, 17.7 प्रतिषत उत्तरदाताओं का मानसिक तनाव नहीं होता। समय पर वेतन नहीं मिलने के कारण भी शिक्षिकाओं को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।
परिवार का असहयोगात्मक रवैया एवं अत्याधिक अपेक्षाएँ जिसे पूरा ना कर पाने की स्थिति में उनके मन में हीनभावना पैदा हो जाती है जिससे उन्हें अपनी भूमिका से संतुष्टि नहीं मिल पाती। कई शिक्षिकाओं का स्कूल निवास स्थल से अधिक दूरी पर रहने के कारण भी उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
उपरोक्त तालिका क्रमांक 05 से स्पष्ट है कि सर्वाधिक 41.3 प्रतिशत शिक्षिकाओं को वेतन समय पर नहीं मिलने से मानसिक चिंता बढ़ जाती है, 32 प्रतिषत उत्तरदाताओं की समय पर जरूरत पूरी न होने से चिड़चिड़ापन, 17.3 प्रतिषत उत्तरदाताओं को पैसे का अभाव, 9.4 प्रतिषत उत्तरदाताओं को षासन के प्रति आक्रोश आता है।
जीवन की सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक रूप से सुरक्षा बहुत जरुरी है। शिक्षिकाओं का वेतन समय पर कभी नहीं मिलता जिससे उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बच्चों की स्कूल फीस, आवश्यकता की सामग्री, राशन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाने से मानसिक चिंता हो जाती है।
निष्कर्ष-
वर्तमान में षिक्षिकाओं को बहुत सारे कार्य एक समय पर निपटाने होते हैं दोहरी भूमिका के कारण षिक्षिकाएँ बहुत अधिक थक जाती हैं और तनाव उत्पन्न होता है जिससे शरीरिक व मानसिक समस्या होती है। उन्हें घरेलू काम के साथ-साथ नौकरी में भी समय पर पहुँचना आवश्यक है और इसी बात को सोचकर वे बहुत अधिक तनावग्रस्त हो जाती है और तनाव के कारण कई प्रकार की मानसिक बिमारियाँ हो जाती हैं। परिवार को भी पर्याप्त समय नहीं दे पाने से स्वयं में असंतुष्ट एवं असफल महसूस करने लगती हैं।
संदर्भ-
1. माथुर दीपा,‘‘वुमैन फैमिली एण्ड वर्क, रावत पब्लिकेषन जयपुर, संस्करण 2007 पृ. 41.
2. कपूर प्रमिला ‘‘मैरिज एण्ड द वर्किंग विमेन इन इंडिया‘‘, विकास पब्लिकेषन, दिल्ली 1970पृ.14
3. गुप्ता सुभाषचंद्र‘‘कार्यषील महिलायें एवं भारतीय समाज‘‘ अर्जुन पब्लिकेषन हाऊस, नई दिल्ली, 2004 पृ. 130
4. जेठानी उर्मिला ‘‘सिंगल विमेन‘‘ रावत पब्लिकेषन, नई दिल्ली, 1994 पृ. 81
5. देसाई नीरा ‘‘विमेन इन मार्डन इंडिया‘ वोरा एण्ड कंपनी पब्लिकशन प्राइवेट लिमिटेड, बाम्बे 1957 पृ. 34
Received on 25.09.2017 Modified on 22.10.2017
Accepted on 12.11.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(4):193-196.